श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  6.14.44 
कृतद्युतिरजानन्ती सपत्नीनामघं महत् ।
सुप्त एवेति सञ्चिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरद्गृहे ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
अपना सौतों द्वारा विष दिए जाने से अंजान रानी कृतद्युति घर में यहाँ-वहाँ विचरती रही यह सोचकर कि उसका पुत्र गहरी नींद में सो रहा है। उसे यह नहीं पता था कि वह मर चुका है।
 
अपना सौतों द्वारा विष दिए जाने से अंजान रानी कृतद्युति घर में यहाँ-वहाँ विचरती रही यह सोचकर कि उसका पुत्र गहरी नींद में सो रहा है। उसे यह नहीं पता था कि वह मर चुका है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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