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श्लोक 6.14.21  |
आत्मन: प्रीयते नात्मा परत: स्वत एव वा ।
लक्षयेऽलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम् ॥ २१ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजा चित्रकेतु! मुझे लग रहा है कि तुम्हारा मन प्रसन्न नहीं है। तुम अपने मन का इच्छित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए हो। ऐसा किस कारण हुआ है यह बताओ, क्या ये तुम्हारे अपने कारण है या फिर किसी दूसरे कारण से हुआ है? तुम्हारे पीले चेहरे से तुम्हारी चिंतन की गहराई का बोध हो रहा है। |
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| हे राजा चित्रकेतु! मुझे लग रहा है कि तुम्हारा मन प्रसन्न नहीं है। तुम अपने मन का इच्छित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए हो। ऐसा किस कारण हुआ है यह बताओ, क्या ये तुम्हारे अपने कारण है या फिर किसी दूसरे कारण से हुआ है? तुम्हारे पीले चेहरे से तुम्हारी चिंतन की गहराई का बोध हो रहा है। |
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