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श्लोक 6.11.18  |
अथो हरे मे कुलिशेन वीर
हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह ।
तत्रानृणो भूतबलिं विधाय
मनस्विनां पादरज: प्रपत्स्ये ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| किन्तु इस युद्ध में यदि तुम अपने वज्र से मेरा सर ही काट डालो तथा मेरे सैनिकों को मार दो तो हे इन्द्र! हे महान वीर! मैं अन्य प्राणियों (जैसे कि सियार व गिद्ध) को अपना शरीर अर्पित करने में अति प्रसन्न हूँगा। इससे मैं अपने कर्म प्रतिक्रियाओं के बंधन से मुक्त हो जाऊँगा और मेरा सौभाग्य यह रहेगा कि मैं नारद मुनि जैसे महान भक्तों के चरणकमलों की धूलि प्राप्त करूँ। |
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| किन्तु इस युद्ध में यदि तुम अपने वज्र से मेरा सर ही काट डालो तथा मेरे सैनिकों को मार दो तो हे इन्द्र! हे महान वीर! मैं अन्य प्राणियों (जैसे कि सियार व गिद्ध) को अपना शरीर अर्पित करने में अति प्रसन्न हूँगा। इससे मैं अपने कर्म प्रतिक्रियाओं के बंधन से मुक्त हो जाऊँगा और मेरा सौभाग्य यह रहेगा कि मैं नारद मुनि जैसे महान भक्तों के चरणकमलों की धूलि प्राप्त करूँ। |
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