श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.11.14 
श्रीवृत्र उवाच
दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपु-
र्यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च ।
दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया
मच्छूलनिर्भिन्नद‍ृषद्‌धृदाचिरात् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीवृत्रासुर बोले: जिसने ब्राह्मण की हत्या की है, जिसने अपने गुरु का वध किया है, और जिसने मेरे भाई की हत्या की है, वो आज किस्मत से ही मेरे सामने शत्रु के रूप में आया है। हे ओछो! जब मैं तुम्हारे पत्थर-जैसे हृदय को अपने त्रिशूल से भेद दूंगा, तब जाकर मैं अपने भाई के ऋण से मुक्त हो पाऊँगा।
 
Shrivritrasura said: He who has killed a Brahmin, he who has killed his Guru, he who has killed my brother, has fortunately stood before me as my enemy. Oh wretch! When I pierce your stone-like heart with my trident, then I will be able to repay my brother's debt.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)