श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  6.1.67 
यदसौ शास्त्रमुल्लङ्‌घ्य स्वैरचार्यतिगर्हित: ।
अवर्तत चिरं कालमघायुरशुचिर्मलात् ॥ ६७ ॥
 
 
अनुवाद
इस ब्राह्मण ने पवित्र शास्त्रों के विधि-विधानों का उल्लंघन करके, अपव्यय करने तथा वेश्या द्वारा बनाया भोजन करने में बड़े ही गैरजिम्मेदारीपूर्ण ढंग से अपना अधिकांश जीवन बिताया। इस कारण वह पापों से भरा हुआ है। वह अशुद्ध है और निषिद्ध कर्मों में लिप्त रहता है।
 
This Brahmin spent his long life in a very irresponsible manner, violating the rules and regulations of the holy scriptures, wasting money and eating food prepared by a prostitute. That is why he is full of sins. He is unclean and indulges in forbidden activities.
तात्पर्य
अशुद्ध, पापी पुरुष या स्त्री, ख़ासकर वेश्या द्वारा बनाया गया भोजन बहुत संक्रामक होता है। अजामिल ने ऐसा ही भोजन खाया था, और इसलिए यमराज द्वारा उसे दंडित किया जाना था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)