सर्व-धर्मान् परित्यज्य
माम् एकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः
"सभी प्रकार के धर्मों को त्याग दो और बस मेरे शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा। चिंता मत करो।" यही सिद्धांत यहाँ (सकृत् मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः) बताया गया है। यदि भगवद् गीता का अध्ययन करके कोई व्यक्ति कृष्ण के शरण में जाने का निश्चय लेता है, तो वह तुरंत सभी पाप कर्मों से मुक्त हो जाता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि शुकदेव गोस्वामी ने कई बार वाुदेव-परायण और नारायण-परायण शब्द दोहराने के बाद अंत में कृष्ण-पदारविन्दयोः कहा। इस प्रकार वह संकेत करते हैं कि कृष्ण नारायण और वासुदेव दोनों के मूल हैं। भले ही नारायण और वासुदेव कृष्ण से भिन्न नहीं हैं, लेकिन बस कृष्ण के शरण में जाने से व्यक्ति उनके सभी विस्तारों, जैसे नारायण, वासुदेव और गोविंद, में पूरी तरह से समर्पण कर देता है। जैसा कि कृष्ण भगवद् गीता (7.7) में कहते हैं, मत्तः परतरं नान्यत्: "मेरे से श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है।" भगवान के कई नाम और रूप हैं, लेकिन कृष्ण सर्वोच्च रूप हैं (कृष्णस्तु भगवान स्वयं)। इसलिए कृष्ण नवोदित भक्तों को सलाह देते हैं कि उन्हें केवल उसी (माम् एकम्) का शरण लेना चाहिए। क्योंकि नवोदित भक्त नहीं समझ सकते कि नारायण, वासुदेव और गोविंद के रूप क्या हैं, कृष्ण सीधे कहते हैं, माम् एकं। यहाँ, इसका समर्थन कृष्ण-पदारविन्दयोः शब्द से भी होता है। नारायण व्यक्तिगत रूप से नहीं बोलते, लेकिन कृष्ण या वासुदेव बोलते हैं, जैसा कि उदाहरण के लिए भगवद् गीता में है। इसलिए, भगवद् गीता के निर्देशों का पालन करने का अर्थ है कृष्ण के शरण में जाना, और इस तरह से समर्पण करना भक्ति-योग की सर्वोच्च पूर्णता है।
परीक्षित महाराज ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा था कि कैसे नारकीय जीवन की विभिन्न स्थितियों में गिरने से बचा जा सकता है। इस श्लोक में शुकदेव गोस्वामी उत्तर देते हैं कि एक आत्मा जिसने कृष्ण के शरण में समर्पण कर दिया है वह निश्चित रूप से नरक में नहीं जा सकता है, नारकीय अस्तित्व में। वहाँ जाने की तो बात ही क्या, अपने सपनों में भी वह यमराज या उनके आदेश वाहक, जो उसे वहाँ ले जाने में सक्षम हैं, को नहीं देखता है। दूसरे शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति नरक, नारकीय जीवन में गिरने से खुद को बचाना चाहता है, तो उसे कृष्ण के शरण में पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए। सकृत् शब्द महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इंगित करता है कि यदि कोई एक बार ईमानदारी से कृष्ण के शरण में आ जाता है, तो वह बच जाता है, भले ही संयोग से वह पापपूर्ण गतिविधियों को करने के कारण गिर जाता है। इसलिए कृष्ण भगवद् गीता (9.30) में कहते हैं:
अपि चेत सु-दुराचारो
भजते माम अनन्य-भाक्
साधुर् एव स मन्तव्यः
सम्यक् व्यवसितो हि सः
"भले ही कोई सबसे घृणित कार्य करता हो, यदि वह भक्ति सेवा में लगा हुआ है तो उसे संत माना जाना चाहिए क्योंकि वह ठीक से स्थित है।" यदि कोई भी क्षण के लिए कृष्ण को नहीं भूलता है, तो वह सुरक्षित है, भले ही संयोग से वह पाप कर्म करने के कारण गिर जाता है।
भगवद् गीता के दूसरे अध्याय (2.40) में भगवान यह भी कहते हैं:
नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति
प्रत्यवायो न विद्यते
स्वल्पम अप्यस्य धर्मस्य
त्रायते महतो भयात्
"इस प्रयास में कोई हानि या कमी नहीं है, और इस मार्ग पर थोड़ी सी उन्नति भी व्यक्ति को सबसे खतरनाक प्रकार के भय से बचा सकती है।" गीता में कहीं और (6.40) भगवान कहते हैं, न हि कल्याण-कृत कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति: "जो शुभ कार्य करता है वह कभी भी बुराई से दूर नहीं होता है।" कृष्ण के शरण में जाना सबसे श्रेष्ठ कल्याण (शुभ) कार्य है। यही एकमात्र मार्ग है जिससे व्यक्ति नारकीय जीवन में गिरने से खुद को बचा सकता है। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ने इसकी पुष्टि इस प्रकार की है:
कैवल्यं नरकायते त्रि-दश-पूर आकाश-पुष्पायते
दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते
विश्वं पूर्न-सुखायते विधि-महेन्द्रादिश च कीटायते
यत्-कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरम एव स्तुमः
(चैतन्य-चंद्रामृत 5)
कृष्ण की शरण में आये व्यक्ति के पापपूर्ण कर्म सर्प के विषैले दांतों को निकालने (प्रोत्खात-दंष्ट्रायाते) के समान माने जाते हैं। ऐसे सर्प से अब भय नहीं रहता। बेशक, कृष्ण की शरण में आने भर से ही पापपूर्ण कर्म नहीं किये जाने चाहिए। लेकिन, फिर भी अगर किसी कृष्ण-आश्रित व्यक्ति से पूर्व की आदतों के कारण कोई पाप हो जाता है, तो ऐसे पापपूर्ण कर्मों का विनाशकारी प्रभाव नहीं रहता। इसलिए कृष्ण के चरण कमलों का बहुत ही दृढ़ता से आश्रय लेना चाहिए और गुरु के निर्देशन में उनकी सेवा करनी चाहिए। इस प्रकार सभी परिस्थितियों में व्यक्ति अकुटो-भय से मुक्त रहेगा, अर्थात भय से मुक्त हो जायेगा।
