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श्लोक 5.8.3  |
| तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत् ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब वह हिरनी अगाध तृप्ति से निर्झर का जल पी रही थी, एक सिंह ने जो उसके बिलकुल पास ही था तीव्र और भयावह गर्जना की। इस गर्जना से सभी प्राणी भयभीत हो गये और उस हिरनी ने भी यह गर्जना सुनी। |
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| जब वह हिरनी अगाध तृप्ति से निर्झर का जल पी रही थी, एक सिंह ने जो उसके बिलकुल पास ही था तीव्र और भयावह गर्जना की। इस गर्जना से सभी प्राणी भयभीत हो गये और उस हिरनी ने भी यह गर्जना सुनी। |
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