श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.8.29 
अहो कष्टं भ्रष्टोऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्तसमस्तसङ्गस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनि सर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणाभियोगेनाशून्यसकलयामेन कालेन समावेशितं समाहितं कार्त्स्‍न्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनु परिसुस्राव ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
मृग के शरीर में भरत महाराज पश्चात्ताप करने लगे - कैसा दुर्भाग्य है कि मैं आत्मज्ञान के पथ से गिर गया हूँ! साधना के लिए मैंने अपने पुत्रों, पत्नी और घर का परित्याग किया और जंगल के एक पवित्र स्थान में रहने लगा। मैं संयमी और आत्मज्ञानी बन गया और भगवान वासुदेव की भक्ति, श्रवण, चिन्तन, कीर्तन, पूजन और स्मरण में निरन्तर लगा रहा। मैं अपने प्रयास में सफल रहा, यहाँ तक कि मेरा मन हमेशा भक्ति में डूबा रहता था। लेकिन, अपनी मूर्खता के कारण मेरा मन पुन: आसक्त हो गया - इस बार एक हिरण में। अब मुझे हिरण का शरीर मिला है और मैं अपनी साधना से बहुत नीचे गिर चुका हूँ।
 
मृग के शरीर में भरत महाराज पश्चात्ताप करने लगे - कैसा दुर्भाग्य है कि मैं आत्मज्ञान के पथ से गिर गया हूँ! साधना के लिए मैंने अपने पुत्रों, पत्नी और घर का परित्याग किया और जंगल के एक पवित्र स्थान में रहने लगा। मैं संयमी और आत्मज्ञानी बन गया और भगवान वासुदेव की भक्ति, श्रवण, चिन्तन, कीर्तन, पूजन और स्मरण में निरन्तर लगा रहा। मैं अपने प्रयास में सफल रहा, यहाँ तक कि मेरा मन हमेशा भक्ति में डूबा रहता था। लेकिन, अपनी मूर्खता के कारण मेरा मन पुन: आसक्त हो गया - इस बार एक हिरण में। अब मुझे हिरण का शरीर मिला है और मैं अपनी साधना से बहुत नीचे गिर चुका हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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