| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा » अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन » श्लोक 11 |
|
| | | | श्लोक 5.8.11  | | इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्नानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११ ॥ | | | | | | अनुवाद | | मृग से प्रेम के कारण, महाराज भरत उसी मृग के साथ लेटते, टहलते, स्नान करते, यहाँ तक कि उसी के साथ खाना भी खाते। इस तरह उनका मन मृग के स्नेह में बँध गया। | | | | मृग से प्रेम के कारण, महाराज भरत उसी मृग के साथ लेटते, टहलते, स्नान करते, यहाँ तक कि उसी के साथ खाना भी खाते। इस तरह उनका मन मृग के स्नेह में बँध गया। | | ✨ ai-generated | | |
|
|