| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा » अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म » श्लोक 6 |
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| | | | श्लोक 5.3.6  | | परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिलसितकिसलयतुलसिकादूर्वाङ्कुरैरपि सम्भृतया सपर्यया किल परम परितुष्यसि ॥ ६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे परमेश्वर, आप हर तरह से पूर्ण हैं। जब आपके भक्त गद्गद् वाणी से आपकी स्तुति करते हैं तथा आनंद से तुलसीदल, जल, पल्लव और दूब के अंकुर चढ़ाते हैं, तो आप निश्चय ही परम सन्तुष्ट हो जाते हैं। | | | | हे परमेश्वर, आप हर तरह से पूर्ण हैं। जब आपके भक्त गद्गद् वाणी से आपकी स्तुति करते हैं तथा आनंद से तुलसीदल, जल, पल्लव और दूब के अंकुर चढ़ाते हैं, तो आप निश्चय ही परम सन्तुष्ट हो जाते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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