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श्लोक 5.3.20  |
| बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभि: प्रसादितो नाभे: प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| हे विष्णुदत्त परीक्षित महाराज, उस यज्ञ के ऋषियों से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए। फलस्वरूप उन्होंने स्वयं धर्माचरण करके दिखलाने (जैसा कि ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा गृहस्थ करते हैं) और महाराज नाभि की मनोकामना को पूरा करने का निश्चय किया। अत: वे अपने गुणातीत आद्य सत्व रूप में मेरुदेवी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने इस प्रकार अपनी भक्ति को बढ़ाया। |
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| हे विष्णुदत्त परीक्षित महाराज, उस यज्ञ के ऋषियों से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए। फलस्वरूप उन्होंने स्वयं धर्माचरण करके दिखलाने (जैसा कि ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा गृहस्थ करते हैं) और महाराज नाभि की मनोकामना को पूरा करने का निश्चय किया। अत: वे अपने गुणातीत आद्य सत्व रूप में मेरुदेवी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने इस प्रकार अपनी भक्ति को बढ़ाया। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत तीसरा अध्याय समाप्त होता है । |
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