श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.3.13 
किञ्चायं राजर्षिरपत्यकाम: प्रजां भवाद‍ृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि भवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमिवाधन: फलीकरणम् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
हे ईश्वर, आपके चरणों में महाराज नाभि हैं, जिनका जीवन लक्ष्य सिर्फ इतना है कि आप जैसा पुत्र उन्हें प्रदान करें। हे भगवान, उनकी दशा बिलकुल वैसी ही है, जैसे कोई व्यक्ति किसी अमीर आदमी के पास जाता है और उससे अन्न मांगता है। उन्हें पुत्र की इतनी इच्छा है कि वह आपकी सेवा कर रहे हैं, हालाँकि आप उन्हें स्वर्गलोक या मुक्ति तक दे सकते हैं।
 
हे ईश्वर, आपके चरणों में महाराज नाभि हैं, जिनका जीवन लक्ष्य सिर्फ इतना है कि आप जैसा पुत्र उन्हें प्रदान करें। हे भगवान, उनकी दशा बिलकुल वैसी ही है, जैसे कोई व्यक्ति किसी अमीर आदमी के पास जाता है और उससे अन्न मांगता है। उन्हें पुत्र की इतनी इच्छा है कि वह आपकी सेवा कर रहे हैं, हालाँकि आप उन्हें स्वर्गलोक या मुक्ति तक दे सकते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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