श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 3: राजा नाभि की पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.3.11 
असङ्गनिशितज्ञानानलविधूताशेषमलानां भवत्स्वभावानामात्मारामाणां मुनीनामनवरतपरिगुणितगुणगण परममङ्गलायनगुणगणकथनोऽसि ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
हे ईश्वर, सारे विचारशील मुनि और साधु पुरुष हमेशा आपके दैवीय गुणों को गाते जा रहे हैं। इन मुनियों ने पहले से ही अपनी ज्ञान-आग से असीम गंदगी को जला डाला है और इस दुनिया से अपना वैराग्य मजबूत कर लिया है। इस प्रकार उन्होंने आपके गुणों को प्राप्त किया और आत्म-तुष्ट हैं। फिर भी जिन्हें आपके गुणों को जपने में परमानंद आता है, उनके लिए भी आपका दर्शन दुर्लभ है।
 
हे ईश्वर, सारे विचारशील मुनि और साधु पुरुष हमेशा आपके दैवीय गुणों को गाते जा रहे हैं। इन मुनियों ने पहले से ही अपनी ज्ञान-आग से असीम गंदगी को जला डाला है और इस दुनिया से अपना वैराग्य मजबूत कर लिया है। इस प्रकार उन्होंने आपके गुणों को प्राप्त किया और आत्म-तुष्ट हैं। फिर भी जिन्हें आपके गुणों को जपने में परमानंद आता है, उनके लिए भी आपका दर्शन दुर्लभ है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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