[यह वह मंत्र है जिसके द्वारा कुशद्वीप के निवासी अग्निदेव की आराधना करते हैं।] हे अग्निदेव, आप श्री भगवान हरि के अंश हैं और उनके पास सभी हवन सामग्री पहुंचाते हैं। इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हम देवताओं को जो भी यज्ञ-सामग्री अर्पित कर रहे हैं, उसे आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को अर्पित करें, क्योंकि परमेश्वर ही असली उपभोक्ता हैं।
[This is the mantra by which the inhabitants of Kusa-dvipa worship Agni-deva.] O Agni-deva, you are the part and parcel of Sri Bhagavan Hari and you deliver all oblations to Him. Therefore, we pray that whatever sacrificial offerings we are offering to the demigods, you should offer them to the Supreme Personality of Godhead, since the Supreme Lord is the real enjoyer.
तात्पर्य
अर्धदेव परमेश्वर श्रीभगवान के नौकर हैं। अगर कोई अर्धदेवों की पूजा करता है, तो वे अर्धदेव भगवान के सेवक की तरह, कर संग्रहकर्ता नागरिकों से लाकर सरकार के खज़ाने में जमा करते हैं। अर्धदेव चढ़ाए गए प्रसाद को स्वीकार नहीं कर सकते ; वो केवल उसे परमेश्वर श्रीभगवान तक पहुँचाते हैं। जैसा की श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा था "यस्य प्रसादाद् भगवत्प्रसाद:" : चूँकि गुरु परमेश्वर श्रीभगवान के प्रतिनिधि होते हैं, वो उनकी तरफ से जो कुछ भी भेंट की जाती है उसे वो भगवान तक पहुँचाते हैं। इसी तरह, सभी अर्धदेव, परमेश्वर के वफ़ादार नौकर के तौर पर, जो भी कुछ अनुष्ठान के रूप में उन्हें चढ़ाया जाता है उसे परमेश्वर श्रीभगवान तक पहुँचाते हैं। इसे समझते हुए अर्धदेवों की पूजा करना गलत नहीं है, पर ये सोचना की अर्धदेव परमेश्वर श्रीभगवान से स्वतंत्र हैं और उतने ही बड़े हैं, उसे हृदयज्ञान, बुद्धि का लोप (कामैस्तैस्तै हृत ज्ञानाः) कहते हैं। जो लोग सोचते हैं की अर्धदेव ही असली भक्त है, उनका ये सोचना गलत है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥