श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.18.8 
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
समस्त शक्ति के स्रोत, भगवान नृसिंहदेव को मैं सादर प्रणाम करता हूँ। हे वज्र के समान नख तथा दांतों वाले प्रभु! आप इस भौतिक जगत में हमारी आसुरी सकाम कर्म-वासनाओं का नाश कर दें। कृपया हमारे हृदय में प्रकट होकर हमारे अज्ञान को दूर करें, जिससे आपके आशीर्वाद से, हम इस भौतिक संसार में निडर होकर जीवन संग्राम में जीत सकें।
 
समस्त शक्ति के स्रोत, भगवान नृसिंहदेव को मैं सादर प्रणाम करता हूँ। हे वज्र के समान नख तथा दांतों वाले प्रभु! आप इस भौतिक जगत में हमारी आसुरी सकाम कर्म-वासनाओं का नाश कर दें। कृपया हमारे हृदय में प्रकट होकर हमारे अज्ञान को दूर करें, जिससे आपके आशीर्वाद से, हम इस भौतिक संसार में निडर होकर जीवन संग्राम में जीत सकें।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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