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श्लोक 5.18.29  |
| हिरण्मयेऽपि भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषै: पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा – हिरण्मयवर्ष में भगवान विष्णु कच्छप के रूप में निवास करते हैं। यह परम प्रिय एवं सुंदर रूप है जिसकी हमेशा हिरण्मयवर्ष के प्रमुख निवासी अर्यमा तथा उस वर्ष के अन्य निवासी करते हैं । वे इस प्रकार स्तुति करते हैं । |
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| शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा – हिरण्मयवर्ष में भगवान विष्णु कच्छप के रूप में निवास करते हैं। यह परम प्रिय एवं सुंदर रूप है जिसकी हमेशा हिरण्मयवर्ष के प्रमुख निवासी अर्यमा तथा उस वर्ष के अन्य निवासी करते हैं । वे इस प्रकार स्तुति करते हैं । |
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