श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.18.28 
भवान् युगान्तार्णव ऊर्मिमालिनि
क्षोणीमिमामोषधिवीरुधां निधिम् ।
मया सहोरु क्रमतेऽज ओजसा
तस्मै जगत्प्राणगणात्मने नम इति ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे सर्वशक्तिमान प्रभु, कल्पान्त मे यह धरती जो कि सभी प्रकार की जड़ी-बूटियों और वृक्षों का भंडार है, जल प्रलय की भयावह लहरों में डूब गई थी। उस समय आपने धरती समेत मेरी रक्षा की और समुद्र में बड़ी तेजी से घूमते रहे। हे अजन्मे, आप ही इस सम्पूर्ण सृष्टि के वास्तविक पालनकर्ता हैं, इसलिए आप ही सभी जीवों के कारण हो। मैं आपको सम्मानपूर्वक नमन करता हूँ।
 
हे सर्वशक्तिमान प्रभु, कल्पान्त मे यह धरती जो कि सभी प्रकार की जड़ी-बूटियों और वृक्षों का भंडार है, जल प्रलय की भयावह लहरों में डूब गई थी। उस समय आपने धरती समेत मेरी रक्षा की और समुद्र में बड़ी तेजी से घूमते रहे। हे अजन्मे, आप ही इस सम्पूर्ण सृष्टि के वास्तविक पालनकर्ता हैं, इसलिए आप ही सभी जीवों के कारण हो। मैं आपको सम्मानपूर्वक नमन करता हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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