श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.18.25 
ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नम: सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सत्त्वस्वरूप श्री भगवान को नमन करता हूँ। वे प्राण, शारीरिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति और ज्ञानेंद्रिय शक्ति के मूल स्रोत हैं। समस्त अवतारों में सबसे पहले अवतरित हुए मत्स्यावतार के रूप में, वे विशाल मछली की तरह प्रकट हुए थे। मैं पुनः उन्हें नमन करता हूँ।
 
मैं सत्त्वस्वरूप श्री भगवान को नमन करता हूँ। वे प्राण, शारीरिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति और ज्ञानेंद्रिय शक्ति के मूल स्रोत हैं। समस्त अवतारों में सबसे पहले अवतरित हुए मत्स्यावतार के रूप में, वे विशाल मछली की तरह प्रकट हुए थे। मैं पुनः उन्हें नमन करता हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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