श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.18.11 
यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं
तीर्थं मुहु: संस्पृशतां हि मानसम् ।
हरत्यजोऽन्त: श्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं
को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जिन व्यक्तियों के लिए परम पुरुषोत्तम भगवान् मुकुन्द ही सब कुछ हैं, उनकी संगति करने से भगवान् के यशस्वी कार्यों को सुनकर शीघ्र ही समझ सकते हैं। मुकुन्द के यशस्वी कार्य इतने सक्षम हैं कि इनको सुनकर ही भगवान् का साक्षात्कार किया जा सकता है। निरन्तर उत्सुकतापूर्वक भगवान् के यशस्वी कार्यों का वर्णन सुनते रहने से परम सत्य श्रीभगवान् ध्वनि तरंगों के रूप में हृदय में प्रवेश करते हैं और समस्त कल्मषों को दूर कर देते हैं। दूसरी ओर यद्यपि गंगास्नान से मल तथा संदूषण घटते हैं, किन्तु स्नान तथा पवित्र स्थानों के दर्शन से बहुत समय बाद जाकर हृदय स्वच्छ हो पाता है। अतः कौन ऐसा विज्ञपुरुष होगा जो जीवन की सिद्धि के लिए भक्तों की संगति नहीं करना चाहेगा?
 
जिन व्यक्तियों के लिए परम पुरुषोत्तम भगवान् मुकुन्द ही सब कुछ हैं, उनकी संगति करने से भगवान् के यशस्वी कार्यों को सुनकर शीघ्र ही समझ सकते हैं। मुकुन्द के यशस्वी कार्य इतने सक्षम हैं कि इनको सुनकर ही भगवान् का साक्षात्कार किया जा सकता है। निरन्तर उत्सुकतापूर्वक भगवान् के यशस्वी कार्यों का वर्णन सुनते रहने से परम सत्य श्रीभगवान् ध्वनि तरंगों के रूप में हृदय में प्रवेश करते हैं और समस्त कल्मषों को दूर कर देते हैं। दूसरी ओर यद्यपि गंगास्नान से मल तथा संदूषण घटते हैं, किन्तु स्नान तथा पवित्र स्थानों के दर्शन से बहुत समय बाद जाकर हृदय स्वच्छ हो पाता है। अतः कौन ऐसा विज्ञपुरुष होगा जो जीवन की सिद्धि के लिए भक्तों की संगति नहीं करना चाहेगा?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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