श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.18.10 
मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु
सङ्गो यदि स्याद्भ‍गवत्प्रियेषु न: ।
य: प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान्
सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रिय: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, हम प्रार्थना करते हैं कि हम पारिवारिक जीवन के बंधन में कभी न बंधें, जिसमें घर, पत्नी, बच्चे, मित्र, धन और रिश्तेदार आदि शामिल हैं। यदि हमारे मन में किसी के प्रति आसक्ति हो भी तो वह भक्तों के प्रति हो, जिनके लिए श्री कृष्ण ही सर्वप्रिय हैं। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति और जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से संतुष्ट रहता है। वह अपनी इंद्रियों की तुष्टि का प्रयास नहीं करता। ऐसा व्यक्ति जल्दी से कृष्णभावनामृत की ओर बढ़ता है, जबकि भौतिक वस्तुओं में अत्यधिक लिप्त रहने वाले व्यक्तियों के लिए ऐसा करना कठिन होता है।
 
हे प्रभु, हम प्रार्थना करते हैं कि हम पारिवारिक जीवन के बंधन में कभी न बंधें, जिसमें घर, पत्नी, बच्चे, मित्र, धन और रिश्तेदार आदि शामिल हैं। यदि हमारे मन में किसी के प्रति आसक्ति हो भी तो वह भक्तों के प्रति हो, जिनके लिए श्री कृष्ण ही सर्वप्रिय हैं। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति और जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से संतुष्ट रहता है। वह अपनी इंद्रियों की तुष्टि का प्रयास नहीं करता। ऐसा व्यक्ति जल्दी से कृष्णभावनामृत की ओर बढ़ता है, जबकि भौतिक वस्तुओं में अत्यधिक लिप्त रहने वाले व्यक्तियों के लिए ऐसा करना कठिन होता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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