श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.17.9 
तथैवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्ब‍हूनि गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्धैमकूटान्यतिरभसतररंहसा लुठयन्ती भारतमभिवर्षं दक्षिणस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्‍नानार्थं चागच्छत: पुंस: पदे पदेऽश्वमेधराजसूयादीनां फलं न दुर्लभमिति ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार अलकनन्दा ब्रह्मपुरी की दक्षिण दिशा से बहती है। अलग-अलग क्षेत्रों के पर्वतों की चोटियों को पार करती हुई यह बहुत तेजी से हेमकूट और हिमकूट पर्वतों की चोटियों पर गिरती है। इन पर्वतों की चोटियों को डुबोती हुई गंगा भारतवर्ष नाम के क्षेत्र में गिरती है और उसे अपने पानी से भरती रहती है। इसके बाद यह दक्षिण दिशा में जाकर नमकीन पानी के सागर से मिल जाती है। जो लोग इस नदी में स्नान करने आते हैं, वे भाग्यशाली होते हैं। उन्हें कदम-कदम पर राजसूय और अश्वमेध जैसे महान यज्ञ करने का फल पाना मुश्किल नहीं है।
 
इसी प्रकार अलकनन्दा ब्रह्मपुरी की दक्षिण दिशा से बहती है। अलग-अलग क्षेत्रों के पर्वतों की चोटियों को पार करती हुई यह बहुत तेजी से हेमकूट और हिमकूट पर्वतों की चोटियों पर गिरती है। इन पर्वतों की चोटियों को डुबोती हुई गंगा भारतवर्ष नाम के क्षेत्र में गिरती है और उसे अपने पानी से भरती रहती है। इसके बाद यह दक्षिण दिशा में जाकर नमकीन पानी के सागर से मिल जाती है। जो लोग इस नदी में स्नान करने आते हैं, वे भाग्यशाली होते हैं। उन्हें कदम-कदम पर राजसूय और अश्वमेध जैसे महान यज्ञ करने का फल पाना मुश्किल नहीं है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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