| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा » अध्याय 17: गंगा-अवतरण » श्लोक 2 |
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| | | | श्लोक 5.17.2  | | यत्र ह वाव वीरव्रत औत्तानपादि: परमभागवतोऽस्मत्कुलदेवताचरणारविन्दोदकमिति यामनुसवनमुत्कृष्यमाणभगवद्भक्तियोगेन दृढं क्लिद्यमानान्तर्हृदय औत्कण्ठ्यविवशामीलितलोचनयुगलकुड्मलविगलितामलबाष्पकलयाभिव्यज्यमानरोमपुलककुलकोऽधुनापि परमादरेण शिरसा बिभर्ति ॥ २ ॥ | | | | | | अनुवाद | | महाराज उत्तानपाद के सुविख्यात पुत्र ध्रुव महाराज को परम-ईश्वर का परम भक्त कहा जाता है, क्योंकि उनकी भक्ति-निष्ठा दृढ़ थी। यह जानते हुए कि गंगाजल भगवान विष्णु के चरणकमल को पखारता है, वे उस जल को अपने लोक में ही रहते हुए आज तक अपने शिर पर भक्तिपूर्वक धारण कर रहे हैं। चूँकि वे अपने अन्तस्थल (हृदय) में श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, फलत: वे अत्यन्त उत्कंठित रहते हैं, उनके अर्ध-निमीलित नेत्रों से अश्रु की धारा बह रही है और उनका शरीर पुलकायमान रहता है। | | | | महाराज उत्तानपाद के सुविख्यात पुत्र ध्रुव महाराज को परम-ईश्वर का परम भक्त कहा जाता है, क्योंकि उनकी भक्ति-निष्ठा दृढ़ थी। यह जानते हुए कि गंगाजल भगवान विष्णु के चरणकमल को पखारता है, वे उस जल को अपने लोक में ही रहते हुए आज तक अपने शिर पर भक्तिपूर्वक धारण कर रहे हैं। चूँकि वे अपने अन्तस्थल (हृदय) में श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, फलत: वे अत्यन्त उत्कंठित रहते हैं, उनके अर्ध-निमीलित नेत्रों से अश्रु की धारा बह रही है और उनका शरीर पुलकायमान रहता है। | | ✨ ai-generated | | |
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