श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.17.19 
न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-र्निरीक्षतो ह्यण्वपि द‍ृष्टिरज्यते ।
ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसांकस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मन: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
हम अपने क्रोध के वेग को नियंत्रित नहीं कर पाते, इसलिए जब हम भौतिक वस्तुओं को देखते हैं तो उनके प्रति आकर्षण या विकर्षण महसूस किए बिना नहीं रह पाते। लेकिन परमेश्वर कभी भी इस तरह प्रभावित नहीं होते। हालाँकि वे सृष्टि, पालन और विनाश के उद्देश्य से भौतिक दुनिया पर दृष्टि डालते हैं, फिर भी वे ज़रा सा भी प्रभावित नहीं होते। इसलिए जो अपनी इंद्रियों के वेग पर विजय प्राप्त करना चाहता है, उसे श्रीभगवान के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए। तभी वह विजयी होगा।
 
हम अपने क्रोध के वेग को नियंत्रित नहीं कर पाते, इसलिए जब हम भौतिक वस्तुओं को देखते हैं तो उनके प्रति आकर्षण या विकर्षण महसूस किए बिना नहीं रह पाते। लेकिन परमेश्वर कभी भी इस तरह प्रभावित नहीं होते। हालाँकि वे सृष्टि, पालन और विनाश के उद्देश्य से भौतिक दुनिया पर दृष्टि डालते हैं, फिर भी वे ज़रा सा भी प्रभावित नहीं होते। इसलिए जो अपनी इंद्रियों के वेग पर विजय प्राप्त करना चाहता है, उसे श्रीभगवान के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए। तभी वह विजयी होगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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