संसार-दावानल-लीढ-लोक-
त्रायणाय कारुण्य-घनाघनत्वम्
इस भौतिक संसार में जीवन हूबहू धधकते जंगल की आग जैसा है। कोई भी जंगल में आग लगाने नहीं जाता है, फिर भी आग लगती है। इसी तरह, हर कोई भौतिक संसार में खुश रहना चाहता है, लेकिन भौतिक जीवन की दयनीय स्थितियां निरंतर बढ़ती ही जाती हैं। कभी-कभी भौतिक अस्तित्व की धधकती आग में फंसा व्यक्ति स्वयं को दोष देता है, लेकिन अपनी शारीरिक अवधारणा के कारण वह उलझन से बाहर नहीं निकल पाता है, और इस प्रकार उसे और अधिक दुख का सामना करना पड़ता है।
