श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.13.26 
राजोवाच
यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहित: परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्यार्यमनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्नलोकसमधिगम: । अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
तब राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा—हे स्वामी, हे परम भक्त साधु, आप सर्वज्ञाता हैं। आपने जंगल के बनिये के रूप में बद्ध जीव की स्थिति का अत्यंत मनोहर वर्णन किया है। इन उपदेशों से कोई भी बुद्धिमान मनुष्य समझ सकता है कि देहात्मबुद्धि वाले पुरुष की इंद्रियाँ उस जंगल में चोर-उचक्कों सी है और उसकी पत्नी और बच्चे सियार व अन्य हिंसक जंतुओं के समान हैं। किन्तु अल्पज्ञानी के लिए इस आख्यान को समझ पाना सरल नहीं है क्योंकि इस रूपक का सही-सही अर्थ निकाल पाना कठिन है। अत: मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि इसका अर्थ स्पष्ट करके बताएँ।
 
तब राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा—हे स्वामी, हे परम भक्त साधु, आप सर्वज्ञाता हैं। आपने जंगल के बनिये के रूप में बद्ध जीव की स्थिति का अत्यंत मनोहर वर्णन किया है। इन उपदेशों से कोई भी बुद्धिमान मनुष्य समझ सकता है कि देहात्मबुद्धि वाले पुरुष की इंद्रियाँ उस जंगल में चोर-उचक्कों सी है और उसकी पत्नी और बच्चे सियार व अन्य हिंसक जंतुओं के समान हैं। किन्तु अल्पज्ञानी के लिए इस आख्यान को समझ पाना सरल नहीं है क्योंकि इस रूपक का सही-सही अर्थ निकाल पाना कठिन है। अत: मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि इसका अर्थ स्पष्ट करके बताएँ।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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