श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.13.23 
नमो महद्‍भ्योऽस्तु नम: शिशुभ्यो
नमो युवभ्यो नम आवटुभ्य: ।
ये ब्राह्मणा गामवधूतलिङ्गा-
श्चरन्ति तेभ्य: शिवमस्तु राज्ञाम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उन महापुरुषों को प्रणाम करता हूं जो इस पृथ्वी पर शिशु, तरुण, अवधूत या महान ब्राह्मण के रूप में विचरण करते हैं। भले ही वे विभिन्न वेशों में छिपे हों, मैं उन सभी को नमन करता हूँ। उनकी कृपा से, उनका अपमान करने वाले राजवंशों का कल्याण हो।
 
मैं उन महापुरुषों को प्रणाम करता हूं जो इस पृथ्वी पर शिशु, तरुण, अवधूत या महान ब्राह्मण के रूप में विचरण करते हैं। भले ही वे विभिन्न वेशों में छिपे हों, मैं उन सभी को नमन करता हूँ। उनकी कृपा से, उनका अपमान करने वाले राजवंशों का कल्याण हो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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