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श्लोक 5.13.18  |
द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो
व्यवायदीनो विवश: स्वबन्धने ।
क्वचित्प्रमादाद् गिरिकन्दरे पतन्
वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थित: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब जीवात्मा बिलकुल एक बंदर के समान बन जाता है जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदता रहता है तो वह गृहस्थ जीवन के पेड़ में बस भोग-विलास (संभोग) के लिए ही रहता है। इस तरह वह अपनी पत्नी से ठीक उसी तरह लातें खाता है जैसे कि गधा गधी से खाता है। मुक्ति का कोई साधन न पाकर वह बेबस होकर उसी स्थिति में रहता है। कभी-कभी उसे कोई ऐसा असाध्य रोग हो जाता है जो उसे पहाड़ की गुफा में गिरने जैसा लगता है। वह उस गुफा में रहने वाले मृत्यु रूपी हाथी से डर जाता है और लताओं की टहनियों को पकड़कर वहीं लटका रहता है। |
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| जब जीवात्मा बिलकुल एक बंदर के समान बन जाता है जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदता रहता है तो वह गृहस्थ जीवन के पेड़ में बस भोग-विलास (संभोग) के लिए ही रहता है। इस तरह वह अपनी पत्नी से ठीक उसी तरह लातें खाता है जैसे कि गधा गधी से खाता है। मुक्ति का कोई साधन न पाकर वह बेबस होकर उसी स्थिति में रहता है। कभी-कभी उसे कोई ऐसा असाध्य रोग हो जाता है जो उसे पहाड़ की गुफा में गिरने जैसा लगता है। वह उस गुफा में रहने वाले मृत्यु रूपी हाथी से डर जाता है और लताओं की टहनियों को पकड़कर वहीं लटका रहता है। |
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