| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा » अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 5.13.15  | मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा
ममेति सर्वे भुवि बद्धवैरा: ।
मृधे शयीरन्न तु तद्व्रजन्ति
यन्न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति ॥ १५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | ऐसे कई राजनीतिक और सामाजिक वीर पुरुष हैं और थे, जिन्होंने समान शक्ति वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, परंतु वे अज्ञानतावश यह मानते हुए कि यह भूमि उनकी है, वे आपस मे ही लड़ते हैं और युद्ध के मैदान में अपने प्राणों का बलिदान देते हैं। वे उस आध्यात्मिक मार्ग को अपनाने में असमर्थ होते हैं जिसे संन्यासियों ने स्वीकार किया है। वीर पुरुष और राजनीतिक नेता होते हुए भी वे आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर नहीं चल सकते हैं। | | | | ऐसे कई राजनीतिक और सामाजिक वीर पुरुष हैं और थे, जिन्होंने समान शक्ति वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, परंतु वे अज्ञानतावश यह मानते हुए कि यह भूमि उनकी है, वे आपस मे ही लड़ते हैं और युद्ध के मैदान में अपने प्राणों का बलिदान देते हैं। वे उस आध्यात्मिक मार्ग को अपनाने में असमर्थ होते हैं जिसे संन्यासियों ने स्वीकार किया है। वीर पुरुष और राजनीतिक नेता होते हुए भी वे आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर नहीं चल सकते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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