| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा » अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता » श्लोक 11 |
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| | | | श्लोक 5.13.11  | क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष-
प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते ।
क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चिद्
विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥ ११ ॥ | | | | | | अनुवाद | | कभी-कभी जीव प्राकृतिक आपदाओं से जैसे की कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती गर्मी, तेज हवा, अत्यधिक बारिश से निपटने में लगा रहता है। परन्तु जब वह ऐसा करने में असफल हो जाता है तो बहुत दुखी हो जाता है। कभी-कभी उसे एक के बाद एक व्यापारिक लेन-देन में धोखा दिया जाता है। इस प्रकार धोखा खाकर जीव एक दूसरे से दुश्मनी ठान लेते हैं। | | | | कभी-कभी जीव प्राकृतिक आपदाओं से जैसे की कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती गर्मी, तेज हवा, अत्यधिक बारिश से निपटने में लगा रहता है। परन्तु जब वह ऐसा करने में असफल हो जाता है तो बहुत दुखी हो जाता है। कभी-कभी उसे एक के बाद एक व्यापारिक लेन-देन में धोखा दिया जाता है। इस प्रकार धोखा खाकर जीव एक दूसरे से दुश्मनी ठान लेते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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