मैत्रेय उवाच
त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे
कृतावनामा: प्रययुस्त्रिविष्टपम् ।
सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता
मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गत: ॥ १ ॥
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा: जब भगवान् ने देवताओं को इस प्रकार फिर से आश्वासन दिया तो वे समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो गए और वे सब उन्हें नमस्कार करके अपने-अपने देवलोकों को चले गए। तब भगवान, जो साक्षात सहस्रशीर्ष अवतार हैं, गरुड़ पर सवार होकर अपने दास ध्रुव को देखने के लिए मधुवन गए।
Maharishi Maitreya told Vidura: When the Lord thus reassured the gods, they were relieved of all fear and all of them bowed to Him and went to their respective heavenly abodes. Then the Lord, who is the incarnation of Sahasrasiras, rode on Garuda and went to Madhuvana to see His servant Dhruva.
तात्पर्य
अर्थ : सहस्रशीर्षा शब्द भगवान गार्भोदकशायी विष्णु को संदर्भित करता है। हालांकि भगवान क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रकट हुए थे, यहां उनका वर्णन सहस्रशीर्षा विष्णु के रूप में किया गया है क्योंकि वह गार्भोदकशायी विष्णु से शून्य हैं। श्रील रूप गोस्वामी के लघु-भागवतामृत में अनुसार, उस समय प्रकट होने वाले सहस्रशीर्षा भगवान पृश्निगर्भ नामक अवतार थे। उन्होंने ध्रुव महाराज के निवास के लिए ध्रुवलोक नामक ग्रह का निर्माण किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥