श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.31.6 
यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च ।
तद् गृहेषु प्रसक्तानां प्रायश: क्षपितं प्रभो ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे स्वामी, हम आपको यह बताना चाहते हैं कि हम गृहस्थी में बहुत अधिक आसक्त होने के कारण शिवजी और भगवान विष्णु के उपदेशों को लगभग भूल चुके हैं।
 
हे स्वामी, हम आपको यह बताना चाहते हैं कि हम गृहस्थी में बहुत अधिक आसक्त होने के कारण शिवजी और भगवान विष्णु के उपदेशों को लगभग भूल चुके हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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