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श्लोक 4.31.6  |
यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च ।
तद् गृहेषु प्रसक्तानां प्रायश: क्षपितं प्रभो ॥ ६ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे स्वामी, हम आपको यह बताना चाहते हैं कि हम गृहस्थी में बहुत अधिक आसक्त होने के कारण शिवजी और भगवान विष्णु के उपदेशों को लगभग भूल चुके हैं। |
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| हे स्वामी, हम आपको यह बताना चाहते हैं कि हम गृहस्थी में बहुत अधिक आसक्त होने के कारण शिवजी और भगवान विष्णु के उपदेशों को लगभग भूल चुके हैं। |
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