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श्लोक 4.31.24  |
तेऽपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम् ।
हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययु: ॥ २४ ॥ |
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| अनुवाद |
| नारद के मुख से जग के समस्त दुर्भाग्य को दूर करने वाली भगवान की महिमा सुनकर प्रचेता गण भी भगवान के प्रति आसक्त हो गए। वे भगवान के चरणकमलों का ध्यान करते हुए परम गंतव्य को प्राप्त हुए। |
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| नारद के मुख से जग के समस्त दुर्भाग्य को दूर करने वाली भगवान की महिमा सुनकर प्रचेता गण भी भगवान के प्रति आसक्त हो गए। वे भगवान के चरणकमलों का ध्यान करते हुए परम गंतव्य को प्राप्त हुए। |
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