श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.31.20 
अपहतसकलैषणामलात्म-
न्यविरतमेधितभावनोपहूत: ।
निजजनवशगत्वमात्मनोऽय-
न्न सरति छिद्रवदक्षर: सतां हि ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
सब इच्छाओं का नाश हो जाने से भक्त लोग सभी मानसिक विकारों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार वे भगवान का निरंतर चिंतन और उनका भावपूर्ण स्मरण कर सकते हैं। भगवान् अपने भक्तों को जानते हैं और उन्हें अपने वश में देखते हैं, इसलिए उन्हें क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते, जिस प्रकार सिर के ऊपर का आकाश कभी दिखाई देना बंद नहीं होता।
 
सब इच्छाओं का नाश हो जाने से भक्त लोग सभी मानसिक विकारों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार वे भगवान का निरंतर चिंतन और उनका भावपूर्ण स्मरण कर सकते हैं। भगवान् अपने भक्तों को जानते हैं और उन्हें अपने वश में देखते हैं, इसलिए उन्हें क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते, जिस प्रकार सिर के ऊपर का आकाश कभी दिखाई देना बंद नहीं होता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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