श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.31.17 
यथा नभस्यभ्रतम:प्रकाशा
भवन्ति भूपा न भवन्त्यनुक्रमात् ।
एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमू
रजस्तम:सत्त्वमिति प्रवाह: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजाओ, आकाश में कभी बादल छाए रहते हैं, कभी अंधेरा रहता है तो कभी रोशनी होती है। इन सबका प्रकट होना एक निश्चित क्रम से होता रहता है। इसी तरह सतो, रजो और तमोगुण परब्रह्म में क्रमश: शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। कभी ये प्रकट होते हैं तो कभी लुप्त हो जाते हैं।
 
हे राजाओ, आकाश में कभी बादल छाए रहते हैं, कभी अंधेरा रहता है तो कभी रोशनी होती है। इन सबका प्रकट होना एक निश्चित क्रम से होता रहता है। इसी तरह सतो, रजो और तमोगुण परब्रह्म में क्रमश: शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। कभी ये प्रकट होते हैं तो कभी लुप्त हो जाते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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