| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश » श्लोक 16 |
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| | | | श्लोक 4.31.16  | एतत्पदं तज्जगदात्मन: परं
सकृद्विभातं सवितुर्यथा प्रभा ।
यथासवो जाग्रति सुप्तशक्तयो
द्रव्यक्रियाज्ञानभिदाभ्रमात्यय: ॥ १६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | जिस प्रकार सूर्य की किरणें भी सूर्य से अलग नहीं है, ठीक उसी प्रकार से यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भी परमेश्वर से भिन्न नहीं है। इसीलिए यह परमेश्वर इस भौतिक सृष्टि के अन्दर सर्वत्र व्याप्त हैं। जब हमारी इन्द्रियाँ जागृत रहती हैं, तो वे शरीर का एक अंग लगती हैं, परन्तु जब शरीर सो जाता है, तो सारी इन्द्रिय क्रियाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं। इसी तरह यह पूरा दृश्य जगत हमें अलग लगता है पर यह परम पुरुष से अलग नहीं है। | | | | जिस प्रकार सूर्य की किरणें भी सूर्य से अलग नहीं है, ठीक उसी प्रकार से यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भी परमेश्वर से भिन्न नहीं है। इसीलिए यह परमेश्वर इस भौतिक सृष्टि के अन्दर सर्वत्र व्याप्त हैं। जब हमारी इन्द्रियाँ जागृत रहती हैं, तो वे शरीर का एक अंग लगती हैं, परन्तु जब शरीर सो जाता है, तो सारी इन्द्रिय क्रियाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं। इसी तरह यह पूरा दृश्य जगत हमें अलग लगता है पर यह परम पुरुष से अलग नहीं है। | | ✨ ai-generated | | |
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