| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 31: प्रचेताओं को नारद का उपदेश » श्लोक 12 |
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| | | | श्लोक 4.31.12  | किं वा योगेन साङ्ख्येन न्यासस्वाध्याययोरपि ।
किं वा श्रेयोभिरन्यैश्च न यत्रात्मप्रदो हरि: ॥ १२ ॥ | | | | | | अनुवाद | | जो दिव्य आचरण या क्रियाएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्राप्ति में सहायक नहीं होते, वे बेकार हैं, चाहे वह योग का अभ्यास हो, पदार्थों का विस्तृत विश्लेषणात्मक अध्ययन हो, कठिन तपस्या हो, संन्यास स्वीकार करना हो या वैदिक साहित्य का अध्ययन करना हो। भले ही ये आध्यात्मिक प्रगति के महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रतीत होते हों, परंतु जब तक कोई सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान् हरि को नहीं पहचान लेता, ये सारे काम निरर्थक हैं। | | | | जो दिव्य आचरण या क्रियाएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्राप्ति में सहायक नहीं होते, वे बेकार हैं, चाहे वह योग का अभ्यास हो, पदार्थों का विस्तृत विश्लेषणात्मक अध्ययन हो, कठिन तपस्या हो, संन्यास स्वीकार करना हो या वैदिक साहित्य का अध्ययन करना हो। भले ही ये आध्यात्मिक प्रगति के महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रतीत होते हों, परंतु जब तक कोई सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान् हरि को नहीं पहचान लेता, ये सारे काम निरर्थक हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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