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श्लोक 4.28.7  |
विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् ।
पुत्रान् पौत्रानुगामात्याञ्जायां च गतसौहृदाम् ॥ ७ ॥ |
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| अनुवाद |
| तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर और मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे थे। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य और अन्यमनस्क हो रही थी। |
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| तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर और मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे थे। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य और अन्यमनस्क हो रही थी। |
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