श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.28.7 
विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननाद‍ृतान् ।
पुत्रान् पौत्रानुगामात्याञ्जायां च गतसौहृदाम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर और मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे थे। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य और अन्यमनस्क हो रही थी।
 
तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर और मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे थे। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य और अन्यमनस्क हो रही थी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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