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श्लोक 4.28.58  |
विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया ।
शक्त्यधीश: पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ॥ ५८ ॥ |
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| अनुवाद |
| पाँच दुकानें पाँचों कर्मेन्द्रियाँ हैं। वे पाँच अनादि तत्वों की संयुक्त शक्ति से अपना व्यापार चलाती हैं। इन सभी गतिविधियों के पीछे आत्मा काम कर रहा है। आत्मा पुरुष है और वही सच्चा भोक्ता है। लेकिन, अभी वह शरीर रूपी नगर के भीतर छिपा होने के कारण ज्ञानहीन है। |
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| पाँच दुकानें पाँचों कर्मेन्द्रियाँ हैं। वे पाँच अनादि तत्वों की संयुक्त शक्ति से अपना व्यापार चलाती हैं। इन सभी गतिविधियों के पीछे आत्मा काम कर रहा है। आत्मा पुरुष है और वही सच्चा भोक्ता है। लेकिन, अभी वह शरीर रूपी नगर के भीतर छिपा होने के कारण ज्ञानहीन है। |
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