| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति » श्लोक 55 |
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| | | | श्लोक 4.28.55  | स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् ।
विचरन् पदमद्राक्षी: कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ॥ ५५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | प्रिय मित्र, तुम अभी भी मेरे वही मित्र हो। जबसे तुमने मेरा साथ छोड़ा है, तुम अधिकाधिक भौतिकवादी बनते चले गये हो और मेरी तरफ देखे बिना इस संसार में, जिसे किसी स्त्री ने बनाया है, विभिन्न रूपों में भटकते रहे हो। | | | | प्रिय मित्र, तुम अभी भी मेरे वही मित्र हो। जबसे तुमने मेरा साथ छोड़ा है, तुम अधिकाधिक भौतिकवादी बनते चले गये हो और मेरी तरफ देखे बिना इस संसार में, जिसे किसी स्त्री ने बनाया है, विभिन्न रूपों में भटकते रहे हो। | | ✨ ai-generated | | |
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