श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  4.28.54 
हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ ।
अभूतामन्तरा वौक: सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे मधुर मित्र, मैं और तुम दोनों हंसों के समान हैं। हम दोनों एक ही मानसरोवर जैसे हृदय में साथ-साथ वास करते हैं, यद्यपि हम हजारों वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं, किन्तु फिर भी हम अपने मूल निवास से बहुत दूर हैं।
 
हे मेरे मधुर मित्र, मैं और तुम दोनों हंसों के समान हैं। हम दोनों एक ही मानसरोवर जैसे हृदय में साथ-साथ वास करते हैं, यद्यपि हम हजारों वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं, किन्तु फिर भी हम अपने मूल निवास से बहुत दूर हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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