श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  4.28.48 
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम् ।
दस्युभ्य: क्षत्रबन्धुभ्यो बिभ्यतीं पातुमर्हसि ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजर्षि, उठो, उठो, देखो, “जल से घिरी यह पृथ्वी चोरों और तथाकथित राजाओं से भरी पड़ी है।” संसार बड़ी भयभीत है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम इसकी रक्षा करो।
 
हे राजर्षि, उठो, उठो, देखो, “जल से घिरी यह पृथ्वी चोरों और तथाकथित राजाओं से भरी पड़ी है।” संसार बड़ी भयभीत है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम इसकी रक्षा करो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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