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श्लोक 4.28.47  |
आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाश्रुभि: ।
स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा ॥ ४७ ॥ |
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| अनुवाद |
| जंगल में इकला और विधवा हो जाने पर विदर्भ की राजकुमारी विलाप करने लगी उसका रोना ऐसा था कि उसके आँसू झड़ रहे थे। उसके आँसू उसके स्तनों पर गिर रहे थे जिससे उसके स्तन भीग रहे थे। वह अत्यंत जोर-जोर से रो रही थी। |
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| जंगल में इकला और विधवा हो जाने पर विदर्भ की राजकुमारी विलाप करने लगी उसका रोना ऐसा था कि उसके आँसू झड़ रहे थे। उसके आँसू उसके स्तनों पर गिर रहे थे जिससे उसके स्तन भीग रहे थे। वह अत्यंत जोर-जोर से रो रही थी। |
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