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श्लोक 4.28.46  |
यदा नोपलभेताङ्घ्रावूष्माणं पत्युरर्चती ।
आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥ ४६ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब उसने पतिदेव के चरण दबाये तो अनुभव हुआ कि उनके पैर अब गर्म नहीं हैं, अत: वह समझ गई कि उन्होंने शरीर छोड़ दिया है। पतिदेव के बिना वह चिंतित होने लगीं। उनके बिना वह उस मृगनयनी सी लगीं जो अपने प्रिय के बिना अप्रिय हुई है। |
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| जब उसने पतिदेव के चरण दबाये तो अनुभव हुआ कि उनके पैर अब गर्म नहीं हैं, अत: वह समझ गई कि उन्होंने शरीर छोड़ दिया है। पतिदेव के बिना वह चिंतित होने लगीं। उनके बिना वह उस मृगनयनी सी लगीं जो अपने प्रिय के बिना अप्रिय हुई है। |
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