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श्लोक 4.28.45  |
अजानती प्रियतमं यदोपरतमङ्गना ।
सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥ ४५ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा विदर्भ की बेटी इस आसन से तब तक अपने पति की सेवा करती रही, जब तक कि वह इस शरीर से कूच करके चल बसे। |
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| राजा विदर्भ की बेटी इस आसन से तब तक अपने पति की सेवा करती रही, जब तक कि वह इस शरीर से कूच करके चल बसे। |
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