श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.28.25 
विकृष्यमाण: प्रसभं यवनेन बलीयसा ।
नाविन्दत्तमसाविष्ट: सखायं सुहृदं पुर: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जब राजा पुरंजना को शक्तिशाली यूनानी ने बलपूर्वक घसीटा, तो भी अपनी निरी मूर्खता के कारण वह अपने मित्र और शुभचिंतक, परमात्मा को याद नहीं कर सके।
 
जब राजा पुरंजना को शक्तिशाली यूनानी ने बलपूर्वक घसीटा, तो भी अपनी निरी मूर्खता के कारण वह अपने मित्र और शुभचिंतक, परमात्मा को याद नहीं कर सके।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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