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श्लोक 4.28.18  |
लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी ।
वर्तिष्यते कथं त्वेषा बालकाननुशोचती ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा पुरञ्जन अत्यन्त चिन्तित होकर विचार करने लगा, “हाय! मेरी पत्नी इतने सारे बच्चों से परेशान होकर रहेगी। जब मैं यह शरीर त्याग दूँगा तो वह किस प्रकार परिवार के इन सभी सदस्यों का पालन-पोषण करेगी? हाय! परिवार का पालन-पोषण करने के विचार से उसे अत्यधिक कष्ट होगा।” |
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| राजा पुरञ्जन अत्यन्त चिन्तित होकर विचार करने लगा, “हाय! मेरी पत्नी इतने सारे बच्चों से परेशान होकर रहेगी। जब मैं यह शरीर त्याग दूँगा तो वह किस प्रकार परिवार के इन सभी सदस्यों का पालन-पोषण करेगी? हाय! परिवार का पालन-पोषण करने के विचार से उसे अत्यधिक कष्ट होगा।” |
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