श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.28.13 
यवनोपरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया ।
पुर्यां प्रज्वारसंसृष्ट: पुरपालोऽन्वतप्यत ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
जब नगर के रक्षक सर्प ने देखा कि नागरिकों पर काल-कन्या प्रहार कर रही है और उसने यह भी देखा कि यवनों ने आक्रमण कर उसके घर में आग लगा दी तो वह अत्यधिक उत्तेजित हो गया।
 
जब नगर के रक्षक सर्प ने देखा कि नागरिकों पर काल-कन्या प्रहार कर रही है और उसने यह भी देखा कि यवनों ने आक्रमण कर उसके घर में आग लगा दी तो वह अत्यधिक उत्तेजित हो गया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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