श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.23.7 
तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिल: ।
आरिराधयिषु: कृष्णमचरत्तप उत्तमम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी वाणी और इंद्रियों को नियंत्रित करने, वीर्यपात को रोकने और अपने शरीर के भीतर प्राण-वायु को नियंत्रित करने के लिए महाराज पृथु ने ये कठिन तपस्याएँ कीं। उन्होंने यह सब श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया। इसके अतिरिक्त उनका कोई अन्य उद्देश्य नहीं था।
 
Maharaja Prithu performed all these difficult penances to control his speech and senses, to prevent the semen from ejaculating and to control the life-air inside his body. He did all this to please Shri Krishna. Apart from this, he had no other purpose.
तात्पर्य
कली-युग में निम्नलिखित की सिफारिश की जाती है:

हरि नाम हरि नाम

हरि नामैव केवलम

कलौ नास्त्य एव नास्त्य एव

नास्त्य एव गतिर अन्यथा

(बृहन्नारदीय पुराण)

कृष्ण को पहचानने के लिए, जो कि ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, व्यक्ति को प्रभु के पवित्र नामों का 24 घंटे निरंतर जाप करना चाहिए। दुर्भाग्यशाली लोग जो इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकते, वे दूसरे तपस्या प्रक्रियाओं को स्वीकार किए बिना किसी प्रकार के छद्म ध्यान को निष्पादित करना पसंद करते हैं। तथ्य यह है कि शुद्ध होने के लिए व्यक्ति को या तो ऊपर वर्णित तपस्या की गंभीर विधि को स्वीकार करना होगा या कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए भक्तिपूर्ण सेवा की प्रक्रिया को अपनाना होगा, जो कि सर्वोच्च प्रभु है। जो व्यक्ति कृष्ण चेतन है वह सर्वाधिक बुद्धिमान है क्योंकि कली-युग में ऐसी कठोर तपस्या करना बिल्कुल भी संभव नहीं है। हमें केवल भगवान चैतन्य महाप्रभु जैसे महान व्यक्तित्वों का अनुसरण करने की आवश्यकता है। अपने शिक्शाष्टक में भगवान चैतन्य महाप्रभु ने लिखा है, परम विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्: भगवान कृष्ण के पवित्र नामों की महिमा, जो शुरू से ही हृदय को शुद्ध करते हैं और तुरंत मुक्त करते हैं। भाव-महादावाग्नि-निर्वापनम्। यदि सभी योग का वास्तविक उद्देश्य भगवान कृष्ण को प्रसन्न करना है, तो इस युग के लिए सुझाई गई यह सरल भक्ति-योग प्रणाली पर्याप्त है। हालाँकि, प्रभु की सेवा में लगातार संलग्न रहना आवश्यक है। यद्यपि पृथु महाराज ने भगवान कृष्ण के इस ग्रह पर प्रकट होने से बहुत पहले तपस्या की थी, फिर भी उनका उद्देश्य कृष्ण को प्रसन्न करना था।

ऐसे कई मूर्ख हैं जो दावा करते हैं कि कृष्ण की पूजा केवल पाँच हज़ार साल पहले भारत में भगवान कृष्ण के प्रकट होने के बाद शुरू हुई थी, लेकिन यह एक तथ्य नहीं है। पृथु महाराज ने लाखों साल पहले कृष्ण की पूजा की थी, क्योंकि पृथु महाराज ध्रुव महाराज के परिवार के वंशज थे, जो सत्ययुग युग के दौरान छत्तीस हज़ार वर्षों तक शासन करते थे। जब तक कि उनका कुल जीवन काल एक लाख वर्ष नहीं था, ध्रुव महाराज छत्तीस हज़ार वर्षों तक दुनिया पर कैसे शासन कर सकते थे? मुद्दा यह है कि कृष्ण पूजा सृष्टि की शुरुआत में मौजूद थी और सत्य युग, त्रेता युग और द्वापर युग में भी जारी रही, और अब यह कलियुग में जारी है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, कृष्ण न केवल ब्रह्मा के जीवन के इस सहस्राब्दी में, बल्कि हर सहस्राब्दी में प्रकट होते हैं। इसलिए कृष्ण की पूजा सभी सहस्राब्दियों में की जाती है। ऐसा नहीं है कि कृष्ण की पूजा केवल तब शुरू हुई जब कृष्ण पाँच हज़ार साल पहले इस ग्रह पर प्रकट हुए। यह एक मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष है जो वैदिक साहित्यों द्वारा प्रमाणित नहीं है।

इस श्लोक में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण शब्द हैं ārirādhayiṣuḥ kṛṣṇam acarat tapa uttamam: महाराजा पृथु ने विशेष तौर पर भगवान् कृष्ण की आराधना करने के लिए कठोर तपस्याएँ कीं। कृष्ण अत्यंत दयालु हैं, खास तौर से इस युग में, कि वे अपने पवित्र नाम के दिव्य ध्वनि में प्रकट होते हैं। जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, ārādhito yadi haris tapasā tataḥ kim: यदि कृष्ण की आराधना की जाती है, यदि वह उनकी प्रगति का लक्ष्य है, तो किसी को भी कठोर तपस्याओं की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने गंतव्य तक पहुँच चुका है। यदि, सभी प्रकार की तपस्या करने के बाद भी, कोई कृष्ण तक नहीं पहुँच सकता, तो उसकी सारी तपस्या व्यर्थ है, क्योंकि कृष्ण के बिना सारा तपस्या केवल श्रम ही है, śrama eva hi kevalam (भागवत 1.2.8) इसलिए हमें हतोत्साहित नहीं होना चाहिए क्योंकि हम जंगल में जा कर कठोर तपस्या नहीं कर सकते। हमारा जीवन इतना छोटा है कि हमें वैष्णव आचार्यों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना चाहिए और शांतिपूर्वक कृष्ण भावना का पालन करना चाहिए। निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। नरोत्तम दास ठाकुर सलाह देते हैं, ānande bala hari, bhaja vṛndāvana, śri-guru-vaiṣṇava-pade majāiyā mana: आनंदमय, दिव्य जीवन के लिए, हरे कृष्ण मंत्र का जाप करें, वृंदावन के पवित्र स्थान की पूजा करें और हमेशा भगवान की सेवा में, आध्यात्मिक गुरु और वैष्णवों के प्रति समर्पित रहें। इसलिए यह कृष्ण भावना आंदोलन बहुत ही सुरक्षित और सरल है। हमें केवल प्रभु के आदेश का पालन करना है और उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पण करना है। हमें केवल आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करना है, कृष्ण भावना का प्रचार करना है और वैष्णवों के मार्ग का अनुसरण करना है। आध्यात्मिक गुरु भगवान कृष्ण और वैष्णवों दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करके और हरे कृष्ण का जाप करके, सब कुछ ठीक हो जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)