श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.23.33 
त्रि: कृत्व इदमाकर्ण्य नरो नार्यथवाद‍ृता ।
अप्रज: सुप्रजतमो निर्धनो धनवत्तम: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
ये कोई मायने नहीं रखता कि व्यक्ति पुरुष है या महिला। जो कोई भी महाराज पृथु के इस वृत्तांत को अत्यंत श्रद्धा के साथ सुनता है, वह यदि संतानहीन है, तो संतान युक्त और निर्धन है, तो वह धनवान बन जाता है।
 
Be it man or woman, whoever listens to this story of Maharaja Prithu with great respect, if he is childless, he becomes blessed with children and if he is poor, he becomes rich.
तात्पर्य
भौतिकवादी व्यक्ति जो धन और महान परिवारों के अत्यंत शौक़ीन होते हैं, वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं, विशेष रूप से देवी दुर्गा, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा। ऐसे भौतिकवादी व्यक्तियों को श्रीयैश्वर्य-प्रजेप्सवः कहा जाता है। श्री का अर्थ है "सुंदरता", ऐश्वर्य का अर्थ है "धन", प्रजा का अर्थ है "संतान" और ईप्सवः का अर्थ है "इच्छुक"। जैसे कि श्रीमद-भागवतम के दूसरे कांडो में वर्णित है, किसी को भिन्न-भिन्न प्रकार के वरदान प्राप्त करने के लिए विभिन्न देवताओं की पूजा करनी पड़ती है। यहाँ पर संकेत किया गया है कि केवल महाराजा पृथु के जीवन और चरित्र के बारे में सुनने से ही व्यक्ति धन और संतान दोनों ही अत्यधिक मात्रा में प्राप्त कर सकता है। किसी को केवल पृथु महाराज के जीवन और गतिविधियों के इतिहास को पढ़ना और समझना है। यह सलाह दी जाती है कि उन्हें कम से कम तीन बार पढ़ा जाए। जो भौतिक रूप से पीड़ित हैं, उन्हें भगवान और उनके भक्तों के बारे में सुनकर इतना लाभ होगा कि उन्हें किसी भी देवता के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। इस छंद में शब्द सुप्रजतमः, "कई बच्चों से घिरा हुआ" बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी के कई बच्चे हो सकते हैं, लेकिन कोई भी योग्य संतान नहीं हो सकती है। यहाँ, हालाँकि, यह कहा गया है (सु-प्रजतमः) कि प्राप्त सभी संताने शिक्षा, धन, सुंदरता और शक्ति में योग्य होंगी - सब कुछ पूर्ण होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)