मैत्रेय उवाच
स्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोकं गता वधू: ।
यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्य: प्रापाच्युताश्रय: ॥ २९ ॥
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, जब देवता पत्नियाँ परस्पर ऐसे संवाद कर रही थीं, तब तक रानी अर्चि ने उस लोक को प्राप्त कर लिया जहाँ उनके पति सर्वोच्च सद्गति को प्राप्त सर्वोत्कृष्ट स्वरूप वाले महाराज पृथु पहुँच चुके थे।
The sage Maitreya continued: O Vidura, when the wives of the demigods were thus conversing with one another, Archi had attained the region where her husband, the supremely svarupasiddha Maharaja Prithu, had already reached.
तात्पर्य
वैदिक शास्त्रों के अनुसार, जो पत्नी अपने पति के साथ मरती है, या उस अग्नि में प्रवेश करती है जिसमें उसका पति जल रहा है, वह भी उसी ग्रह में प्रवेश करती है जहां उसका पति प्राप्त करता है। इस भौतिक दुनिया में एक ग्रह है जिसे पातिलोक के रूप में जाना जाता है, जैसे कि एक ग्रह है जिसे पितृलोक के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस श्लोक में 'पति-लोक' शब्द इस भौतिक ब्रह्मांड के भीतर किसी भी ग्रह को संदर्भित नहीं करता है, क्योंकि पृथु महाराज, आत्म-साक्षात्कार आत्माओं के बीच सबसे ऊपर होने के कारण, निश्चित रूप से गॉडहेड में वापस घर लौटे, और वैकुंठ ग्रहों में से एक प्राप्त किया। महारानी अर्ची ने भी पातिलोक में प्रवेश किया, लेकिन यह ग्रह भौतिक ब्रह्मांड में नहीं है, क्योंकि वह वास्तव में उस ग्रह में प्रवेश करती है जिसे उसके पति ने प्राप्त किया था। भौतिक दुनिया में भी, जब एक पत्नी अपने पति के साथ मर जाती है, तो वह अगले जन्म में उसके साथ फिर से एक हो जाती है। इसी तरह, महाराज पृथु और महारानी अर्ची वैकुंठ ग्रहों में एकजुट हुए। वैकुण्ठ ग्रहों में पति और पत्नियां हैं, लेकिन बच्चों को जन्म देने या यौन जीवन जीने का कोई सवाल ही नहीं है। वैकुण्ठ ग्रहों पर पति और पत्नी दोनों असाधारण रूप से सुंदर होते हैं, और वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, लेकिन वे यौन जीवन का आनंद नहीं लेते हैं। वास्तव में, वे यौन संबंध को बहुत प्रसन्न करने वाला नहीं मानते हैं क्योंकि पति और पत्नी दोनों हमेशा कृष्ण चेतना में और भगवान के गुणों का महिमामंडन और जप में मग्न रहते हैं। भक्ति विनोद ठाकुर के अनुसार भी, एक पति और पत्नी भौतिक दुनिया में भी रहते हुए घर को वैकुंठ जितना ही अच्छा स्थान बना सकते हैं। कृष्ण चेतना में लीन होकर, इस दुनिया में भी पति और पत्नी केवल घर के भीतर भगवान की मूर्ति स्थापित करके और शास्त्रों के निर्देशों के अनुसार मूर्ति की सेवा करके वैकुंठ में रह सकते हैं। इस तरह, वे कभी भी यौन आग्रह महसूस नहीं करेंगे। यही भक्ति सेवा में उन्नति की परीक्षा है। जो भक्ति सेवा में उन्नत होता है वह कभी भी यौन जीवन से आकर्षित नहीं होता है, और जैसे ही वह यौन जीवन से अलग हो जाता है और भगवान की सेवा से आनुपातिक रूप से जुड़ता है, वह वास्तव में वैकुंठ ग्रहों में रहने का अनुभव करता है। अंतिम मुद्दे में, वास्तव में कोई भौतिक दुनिया नहीं है, लेकिन जब कोई भगवान की सेवा को भूल जाता है और अपनी इंद्रियों की सेवा में उलझ जाता है, तो उसे भौतिक दुनिया में रहने वाला कहा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥